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काशी विश्वनाथ ऐतिहासिक मंदिर

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बाबा विश्वनाथ के प्रकट होने की खबर सुनते ही मन ही मन उनकी पूजा और प्रणाम करते हुवे मेरे मन मे सबसे पहले यही विचार आया कि


श्रीराम के लिए जो अयोध्या गए थे वो कार सेवक थे वो मर्यादित थे क्योंकि भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं
अब जब काशी में भोले बाबा प्रकट हो ही गए ह तो गण भी वही पहुंचेंगे जहां उनके बाबा साक्षात विराजमान रहेंगे , ओर गण मर्यादित नही होते , गण किसी मर्यादा को नही मानते , वो केवल शिव को मानते ह , वो केवल शिव के आदेश को मानते हैं।
वो केवल शिव के तीसरे नेत्र की विध्वंशक भंगिमाओं जमीन पर परिपूर्ण करते हैं।
ये मेरा विश्वास ह की आज बाबा ने स्वम् को प्रकट करने के साथ ही उन लाखों करोड़ों गणों को भी आदेशित कर दिया ह जो कही कंदराओं में , वनों में , हिमालय में झरनों के पास , बर्फीले पहाड़ों पर या ग्रहस्थ में बैठे सदियों से भोलेनाथ की भंगिमाओं पर टकटकी लगाए इंतजार कर रहे थे,
अब कौन रॉक पाएगा इन करोड़ो शिवगणों की मदमस्त ओर भीषण आह्लादित बारात को,
तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं:1669 में ज्ञानवापी कुंड में कूदकर पुजारी ने स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को बचाया था, औरंगजेब की सेना नंदी से हार गई

लेखक: देवांशु तिवारी

ज्ञानवापी मस्जिद आजकल सुर्खियों में है। यहां सर्वे की वजह से सड़क से दिखने वाले ज्ञानवापी के हिस्से को हरे परदे और होर्डिंग से ढक दिया गया। सर्वे करने आई टीम के आते ही मस्जिद के बाहर असहज करने वाला शोर था।

353 साल पहले इस इलाके में आज से भी ज्यादा शोर था। औरंगजेब की सेना ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने के लिए इस क्षेत्र को घेर लिया था। सैनिकों के हाथों में तलवारें थीं और मंदिर को छोड़कर भागते लोगों की चीखें। तब एक पुजारी ने हिम्मत दिखाई थी। स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को बचाने के लिए उसने पूरा जोर लगा दिया था।

पहला फरमान औरंगजेब ने 18 अप्रैल 1669 को जारी किया था

18 अप्रैल 1669 में औरंगजेब ने विश्वनाथ मंदिर पर हमला करने का फरमान जारी किया। उसकी सेना ने मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया, लेकिन इसमें विराजित स्वयंभू ज्योतिर्लिंग पर आंच तक नहीं आई। क्योंकि उस दिन भगवान की रक्षा मंदिर के महंत कर रहे थे। हमलावर सेना को आता देख महंत शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कुंड में कूद गए।

353 साल पुराना ज्ञानवापी कुंड पिछले साल काशी विश्वनाथ मंदिर के विस्तार में कॉरिडोर का हिस्सा बन गया है। ये तस्वीर उसी ज्ञानवापी कुंड की है। इसे वर्ष 1900 के आस-पास कैमरे में कैद किया गया। इस कहानी का जिक्र लंदन के के एम ए शेरिंग की किताब ‘सेक्रेड सिटी आफ द हिंदूज’ में भी है

औरंगजेब की सेना जब स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को नुकसान नहीं पहुंचा पाई। तब उसने मंदिर के बाहर बैठे 5 फीट ऊंची नंदी की मूर्ति पर हमला कर दिया। मूर्ति पर खूब हथौड़े चले, खूब प्रहार किए गए पर नंदी अपनी जगह से हिले नहीं। तमाम प्रयासों के बाद सेना हार गई और नंदी को उसी जगह छोड़ दिया।

यह प्रतिमा ज्ञानवापी मस्जिद की तरफ है। इसे मंदिर के विस्तार में अब कॉरिडोर का हिस्सा माना गया है। ये तस्वीर आजादी से पहले की है।

जेम्स प्रिंसेप के स्केच ने दुनिया को दिखाई ज्ञानवापी की पहली तस्वीर

ज्ञानवापी मस्जिद का ये स्केच एंग्लो-इंडियन स्कॉलर जेम्स प्रिंसेप ने 1834 में बनाया था। स्केच में ध्वस्त हो चुके बनारस के विश्वेश्वर मंदिर के हिस्से को दिखाया गया। इसमें मस्जिद का बड़ा गुंबद और उसके बाहरी छोर पर टूटे हुए हिस्से में बैठे लोग दिख रहे हैं। टूट चुके इस हिस्से की असली दीवार अब ज्ञानवापी मस्जिद में खड़ी है।

ब्रिटिश लाइब्रेरी में आज भी रखा है काशी विश्वनाथ मंदिर का पुराना नक्शा

लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में रखा काशी विश्वनाथ मंदिर का ये नक्शा भी जेम्स प्रिंसेप ने बनाया था। इस नक्शे में काशी विश्वेश्वर मन्दिर के गर्भगृह को बीचो बीच दिखाया गया है। इस पर अंग्रेजी में महादेव लिखा गया है। इसके चारों तरफ दूसरे मन्दिर बने हैं।

नक्शे के नीचे लिखे गए डिस्क्रिप्शन को गौर से देखा जाए, तो अंग्रेजी में लिखा है – The doted line shows the portion of the temple occupied by the present masjid. यानी नक्शे में बनाई गई डॉटेड लाइन मौजूदा मस्जिद के कब्जे वाले मंदिर के हिस्से को दर्शाती है। यह नक्शा 1832 में तैयार किया गया था।

अंग्रेजों के जमाने में भी सिर ऊंचा कर खड़ा रहा 5 फीट का

काशी विश्वनाथ मंदिर की ये तस्वीर 1890 में ली गई थी। हमें इसके फोटोग्राफर की जानकारी नहीं मिल पाई है। तस्वीर में ज्ञानवापी कुंड के सामने स्थापित नंदी की मूर्ति और उसके ठीक बगल में बने मंदिर में बैठे पुजारी को देखा जा सकता है। इस दरमियान काशी में ब्रिटिश हुकूमत अपना नॉर्दन हेडक्वार्टर का निर्माण करवा रही थी।

1880 में खींची गई इस तस्वीर में फिर दिखी ज्ञानवापी

तस्वीर में काशी विश्वनाथ मंदिर में बने ज्ञानवापी कुंड में बड़ी संख्या में पुजारी रोज की पूजा में शामिल होने के लिए इकट्ठा हुए हैं। तस्वीर के दाहिने हिस्से में विशाल नंदी की मूर्ति को देखा सकता है। ज्ञानवापी कुंड से ठीक पीछे ऊपर की ओर देखने पर मस्जिद का थोड़ा सा हिस्सा भी दिखाई देता है। फोटो 1880 की है।

ज्ञानवापी की एक तस्वीर 2022 की भी है

ज्ञानवापी मस्जिद में 6 मई को पुरातात्विक विभाग ने सर्वे किया। इससे पहले ज्ञानवापी परिसर के बाहर सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गई। प्रशासन ने स्थिति कंट्रोल करने लिए लोकल इंटेलिजेंस यूनिट के साथ आईबी की टीमें पूरे इलाके में तैनात कर दी। इसके अलावा पैरामिलिट्री फोर्स और पीएसी को भी स्टैंडबाई मोड पर रखा गया।
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩कोर्ट द्वारा सर्वे कराये जाने के बाद प्राप्त तथ्यो के आधार पर ज्ञानवापी परिसर के अंदर जो हमारा ही तीर्थक्षेत्र अविमुक्तेश्वर विश्वेश्वर का आदि स्थान और ज्ञानोद तीर्थ की पवित्र भूमि है, में मंदिर विध्वंस के बाद निर्मित आलगीर मस्जिद का अस्तित्व हमारे तीर्थ की सत्यता के कारण बौना पड़ ही गया जब वहां पवित्र शिवलिंग का प्राकट्य हुआ।
आज हर एक सनातनी हर्षोल्लास से भरा हुआ है लेकिन इस बीच *शायद हम भूल गये इस धर्म युद्ध के सबसे बड़े योद्धा व्यास परिवार को। आदरणीय पूजनीय स्व सोमनाथ व्यास को औरआदरणीय पूजनीय स्व केदारनाथ व्यास को* जिन्होंने 150 सालों से ज्ञानवापी की कानूनी लड़ाई लड़ी है। अनेक दुर्लभ पांडुलिपियां,ग्रंथों के रचयिता वही पूजनीय स्व केदारनाथ व्यास।
ज्ञानवापी की संपत्ति पर मालिकाना हक और स्थापत्य स्व केदारनाथ व्यास के परिवार का रहा है

आज इन्ही पूजनीय केदारनाथ व्यास की बदौलत हिंदू पक्ष कानून ज्ञानवापी पर दावा कर सकता है।
इन्ही व्यास परिवार की बदौलत सन् 1936 में दीन मोहम्मद को पूरे ज्ञानवापी में नमाज पढ़ने के दावे को नकार कर कोर्ट ने बैरंग लौटाया था और ज्ञानवापी परिक्षेत्र को वक्फ बोर्ड की संपत्ति होने के दावे से इंकार किया था।

ज्ञानवापी परिसर और बाबा विश्वनाथ का यह विवाद सैकड़ों साल पुराना है.
साल 1991 में ज्ञानवापी मस्जिद के लोहे की बैरिकेडिंग के पहले यह पूरा इलाका खुला हुआ था, इसकी पुरानी तस्वीरें आज भी मौजूद हैं जिसमें ज्ञानवापी मस्जिद के पिछले हिस्से में एक मैदान जैसा था, जबकि मंदिर के खंडहर पर मस्जिद का निर्माण साफ दिखाई देता था.

जब यह पूरी मस्जिद खुली थी तब इसका एक हिस्सा मंदिर के तौर पर भी इस्तेमाल होता था. काफी पहले से यहां विध्वंस के हिस्से में श्रृंगार गौरी की पूजा होती थी जिसके तस्वीर और प्रमाण आज भी मौजूद हैं. हालांकि, तब श्रृंगार गौरी की पूजा की इजाजत सिर्फ साल में एक बार ही दी जाती थी.
मगर साल 1991 के बाद जब ज्ञानवापी परिसर को पूरी तरीके से लोहे के बड़े बैरिकेडिंग से घेर दिया गया और वहां सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित कर दिए गए उसके बाद ना कोई श्रृंगार गौरी की पूजा कर पाता था और ना ही विध्वंस के उस हिस्से को खुली आंखों से देख पाता था.

इस ज्ञानवापी परिसर को लेकर दो मामले- 1936 में सबसे पहले दीन मोहम्मद वर्सेस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का एक मामला है, जिसमें दीन मोहम्मद ने ज्ञानवापी मस्जिद और उसके आसपास की जमीनों पर अपना हक जताया था. इसका मूवी मुकदमा नंबर 62/ 1936 जोकि एडिशनल सिविल जज बनारस के यहां दाखिल हुई थी, तब की अदालत ने इसे मस्जिद की जमीन मानने से इनकार कर दिया. उसके बाद दीन मोहम्मद यह केस लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट गए और 1937 में जब फैसला आया तब हाई कोर्ट ने मस्जिद के ढांचे को छोड़कर बाकी सभी जमीनों पर व्यास परिवार का हक बताया और उनके पक्ष में फैसला दिया.

इसी फैसले में बनारस के तत्कालीन कलेक्टर का वह नक्शा भी फैसले का हिस्सा बनाया गया है जिसमें ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने का मालिकाना हक व्यास परिवार को दिया गया है. तब से आज तक व्यास परिवार ही ज्ञानवापी मस्जिद के नीचे के तहखाना का देखरेख करता है, वहां पूजा करता है और प्रशासन के अनुमति से वही तहखाने को खोल सकता है .आज भी उसमें मंदिर के ढेरों सामान रखे गए हैं.

1937 के इस फैसले में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक नक्शा भी लगाया और उस नक्शे में बकायदा डॉटेड लाइंस के साथ मस्जिद की सीमा रेखा तय की
और उसके अलावा बाकी चारों तरफ की जमीन का फैसला विश्वनाथ मंदिर के व्यासपठ के महंत व्यास परिवार पक्ष में दिया.
तब से ही मस्जिद की अपनी सीमा थी, जबकि बाकी आसपास की पूरी जमीन को व्यास परिवार को दे दिया गया. 1937 के बाद 1991 तक इस मामले में कोई विवाद नहीं हुआ.
व्यास परिवार और उनके वकील के पास पिछले पौने दो सौ साल से लड़े गए मुकदमों की फेहरिस्त और फाइलों का पुलिंदा है. 1937 का मुकदमा दीन मोहम्मद का मुकदमा बाबा विश्वनाथ और ज्ञानवापी मस्जिद के बीच का सबसे अहम मुकदमा माना जाता है. इस मुकदमे की सुनवाई हाई कोर्ट तक चली, जिसमें हाई कोर्ट ने बहुत सारी बातें साफ कर दीं. यानी ढांचागत मस्जिद को छोड़कर तमाम जमीने व्यास परिवार की और बाबा विश्वनाथ मंदिर की होगी. मस्जिद के अलावा आसपास की किसी जमीन पर न तो नमाज हो सकेगी ना ही उर्स या फिर जनाजे की नमाज होगी.

बनारस के रहने वाले दीन मोहम्मद ने Civil Suit कोर्ट में दाखिल किया। Civil Suit 62 of 1936 में किया की जो सेटलमेंट प्लाट -9130 को (वास्तविक काशी विश्वनाथ का पूरा एरिया Revenue Record में 9130 के नाम से जाना जाता है. ) वक्फ प्रॉपर्टी declare किया जाये और उन्हें नमाज पढ़ने का पूरा अधिकार दे दिया जाये। दूसरा पक्ष इस केस में ब्रिटिश सरकार थी , हिन्दुओ ने जब इस केस में पक्ष बनने की बात की तो उसे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ख़ारिज दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने लिखित रूप में कोर्ट में हलफनामा दायर किया और

Paragraph -2 में यह लिखा की यह परिसर वक्फ प्रॉपर्टी नहीं है। (यहाँ आप को जान लेना चाहिए की किसी Valid मस्जिद होने के लिए कोई भी स्थान वक्फ संपत्ति होना चाहिए )
Paragraph -11 में लिखा है की यहाँ की मूर्तिया मुगलकाल के पहले से यहाँ है।
Paragraph -12 इस सम्पत्ति का मालिक औरंगजेब नहीं था। और इस्लामिक law के मुताबिक यह अल्लाह को Dedicate नहीं किया जा सकता। दावेदारों की ओर से सात, ब्रिटिश सरकार की ओर से 15 गवाह पेश हुए थे। सब जज बनारस ने 15 अगस्त 1937 को मस्जिद के अलावा ज्ञानवापी परिसर में नमाज पढऩे का अधिकार नामंजूर कर दिया था।
दीन मोहम्मद इससे खुश नहीं हुए और फिर उन्होंने हाई कोर्ट में Suit दायर किया जिसका Appeal No -466 of 1937 जिसका फैसला आया

1942 SCC OnLine Allahabad/ Page No. 56 के Paragraph-5 में ये HOLD किया है की यहाँ मंदिर तोड़ी गई है। और Paragraph-16 में HOLD किया है की यह वक्फ सम्पति नहीं है.और नमाज पढ़ लेने से किसी स्थान पर आप का उस पर हक़ नहीं हो जाता।

साल 1937 से लेकर 1991 तक दोनों पक्षों में कोई विवाद नहीं हुआ. मुसलमान अपनी मस्जिद में जाते थे, जबकि हिंदू अपने मंदिरों में। हालांकि यह मस्जिद भी 1991 तक विरान ही पड़ी रही, जिसमें इक्के दुक्के मुसलमान ही नमाज अदा करते थे लेकिन बाबरी विध्वंस के बाद से यहां अचानक नमाजियों की संख्या काफी बढ़ गई और तब से यहां हर रोज नमाज होती भी है.

1991 में व्यास परिवार की ओर से स्वामी सोमनाथ व्यास ने एक मुकदमा दर्ज कराया और उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद को ‘आदि विशेश्वर मंदिर’ कहते हुए इसे मंदिर को सौंपने का मामला दर्ज कराया. 1991 से लेकर यह मामला अभी तक चल रहा है और इसी मामले में सुनवाई करते हुए 1996 में पहली बार अदालत ने कोर्ट कमिशन बनाया था और पहला सर्वे 1996 में किया था.
इस मुकदमे में सोमनाथ व्यास की तरफ से विजय शंकर रस्तोगी वकील थे. बाद में सोमनाथ व्यास की मृत्यु के बाद वह वादी मित्र होकर इस मामले की पैरवी कर रहे हैं.

मस्जिद के ढांचे को मंदिर या मूल विश्वेश्वर मंदिर कहकर अदालत में याचिका लगाई गई तो उसमें कई तस्वीरें भी लगाई गईं. वह तमाम तस्वीरें उस विध्वंस किए गए ढांचे की हैं, जो मंदिर दिखाई देता है.

मंदिर के विध्वंस पर बनी मस्जिद की कई तस्वीरें अदालत में सुबूत के तौर पर संलग्न की गईं और उसी को देखते हुए साल 1996 में एक सर्वे कमीशन बनाया गया था. इस केस की सुनवाई के दौरान बनारस की अदालत ने इसमें एएसआई से खुदाई का आदेश दिया था।

आदि विशेश्वर मंदिर’ को तोड़कर बनाया गया है इसका नक्शा भी 1937 में तत्कालीन बनारस के डीएम ने अदालत में सौंपा था. जिस जमीन पर या जिस ढांचे पर आज ज्ञानवापी मस्जिद खड़ी है उस ढांचे का नक्शा पहली बार अदालत में पेश किया था और उस नक्शे में कई चीजें साफ-साफ लिखी हैं. मसलन यह पहला और एकमात्र ऐसा नक्शा है जो दिखाता है कि मंदिरनुमा कोई ढांचा रहा है जिसके बड़े हिस्से पर मस्जिद बनी है, बकायदा डॉटेड लाइन से इस नक्शे पर मस्जिद के हिस्से को दिखाया गया है.

पूजनीय स्व केदारनाथ व्यास 2020 में इहलोक गमन कर गये।
आज भले इन्हें सारा देश ना जानता हो।
आज भले स्वयं को सनातनी कहने वाले लोंगों को इनका योगदान और नाम तक ना पता हो।

*लेकिन महादेव के इस सपूत का, व्यास परिवार का पूरी काशी श्रृणी रहेगी चिरकाल तक*।
महादेव के लोक में महादेव के पुत्र आज चिर निद्रा में सो रहे।

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