ऋषिकेश में भू क़ानून 1950 – मूल निवास को लेकर स्वाभिमान रैली में उमड़ा जन सैलाब
हरिद्वार/ऋषिकेश । मूल निवास 1950, और सशक्त भू-कानून की मांग को लेकर ऋषिकेश में विशाल महारैली का आयोजन किया गया। इस महारैली में प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों लोग शामिल हुए।
‘मूल निवास, भू-कानून समन्वय संघर्ष समिति’ के आह्वान पर हुई इस महारैली में प्रदेश के विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संगठनों, पूर्व सैनिकों, पूर्व कर्मचारियों ने शिरकत की। कार्यक्रम शुरू होने से पूर्व मूल निवास, भू-कानून समन्वय संघर्ष समिति के संयोजक मोहित डिमरी ने नटराज चौक पर उत्तराखंड राज्य निर्माण के नायक रहे श्री इंद्रमणि बडोनी जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
ऋषिकेश के आईडीपीएल हॉकी मैदान में हजारों लोग जमा हुए। रैली में महिलाओं की संख्या अप्रत्याशित रूप से ज्यादा थी। उससे एक बार फिर रेखांकित हो गया कि प्रदेश में फिर 1994 का वो दौर शुरू होने वाला है जब हाथ में दरांती लेकर पहाड़ की महिलाएं उत्तराखंड आंदोलन में कूद पड़ी थी।
इस मौके पर आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए मूल निवास, भू-कानून समन्वय संघर्ष समिति के संयोजक मोहित डिमरी ने कहा कि, 40 से ज्यादा आंदोलनकारियों की शहादत से हासिल हुआ हमारा उत्तराखंड राज्य आज 24 साल बाद भी अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा है।
उन्होंने कहा कि यहां के मूल निवासियों को उनका वाजिब हक नहीं मिल पाया है और अब तो हालात इतने खतरनाक हो चुके हैं कि मूल निवासी अपने ही प्रदेश में दोयम दर्जे के नागरिक बनते जा रहे हैं। आज न मूल निवासियों को नौकरी मिल रही और न ठेकेदारी। हर तरह के संसाधन मूल निवासियों के हाथों खिसकते जा रहे हैं।
डिमरी ने कहा कि मूल निवास की कट ऑफ डेट 1950 लागू करने के साथ ही प्रदेश में मजबूत भू-कानून लागू किया जाना बेहद जरूरी है। मूल निवास का मुद्दा उत्तराखंड की पहचान के साथ ही यहां के लोगों के भविष्य से भी जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि मूल निवास की लड़ाई जीते बिना उत्तराखंड का भविष्य असुरक्षित है। मजबूत भू-कानून न होने से ऋषिकेश ही नहीं पूरे उत्तराखंड में जमीनों की खुली बंदरबांट चल रही है। इससे राज्य की डेमोग्राफी बदल गई है। हमारे लोगों को जमीन का मालिक होना था और वे लोग रिसोर्ट/होटलों में नौकर/चौकीदार बनने के लिए विवश हैं। हम अपने लोगों को नौकर नहीं मालिक बनते हुए देखना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि आज ऋषिकेश अपराधियों का अड्डा बनता जा रहा है। सरेआम मूल निवासियों को मारा-पीटा जा रहा है। ड्रग्स और नशे के कारोबार के कारण हमारे बच्चों का भविष्य ख़त्म हो रहा है।
‘मूल निवास, भू-कानून समन्वय संघर्ष समिति’ के सह संयोजक लुसुन टोडरिया और सचिव प्रांजल नौडियाल ने कहा कि उत्तराखंड के मूल निवासियों के अधिकार सुरक्षित रहें, इसके लिए मूल निवास 1950 और मजबूत भू-कानून लाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज प्रदेश के युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।
समिति से जुड़े हिमांशु बिजल्वाण, कोर मेंबर सुरेंद्र नेगी, और हिमांशु रावत ने कहा कि जिस तरह प्रदेश के मूल निवासियों के हक हकूकों को खत्म किया जा रहा है, उससे एक दिन प्रदेश के मूल निवासियों के सामने पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा।
समिति के गढ़वाल संयोजक अरुण नेगी और कुमांऊ संयोजक राकेश बिष्ट ने कहा कि अगर सरकार जनभावना के अनुरूप मूल निवास और मजबूत भू-कानून लागू नहीं करेगी तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।
उन्होंने कहा कि पिछले साल 24 दिसंबर को देहरादून में हुई महारैली के बाद हल्द्वानी, टिहरी, श्रीनगर और कोटद्वार, गैरसैंण के बाद अब ऋषिकेश में जिस तरह से जनसैलाब उमड़ा है, उससे स्पष्ट है कि राज्य के लोग अपने अधिकारों, सांस्कृतिक पहचान और अस्तित्व को बचाने के लिए निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार हैं। कार्यक्रम का संचालन प्रांजल नौडियाल और संजय सिलस्वाल ने किया।
आगे की रणनीति : स्वाभिमान यात्रा निकालेगी संघर्ष समिति
ऋषिकेश में हुई रैली के बाद मूल निवास आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए जल्द ही अगले कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी। संघर्ष समिति के संयोजक मोहित डिमरी ने बताया कि प्रदेश में मूल निवास की सीमा 1950 और मजबूत भू-कानून लागू करने को लेकर चल रहे आंदोलन को घर-घर में ले जाया जाएगा।अब आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।
उन्होंने कहा कि बहुत जल्द ठोस कार्यक्रम बनाकर पूरे प्रदेश में स्वाभिमान यात्रा शुरू शुरू की जाएगी। डिमरी ने बताया कि चरणबद्ध तरीके से समिति विभिन्न कार्यक्रम करेगी, जिसके तहत गांव-गांव जाने से लेकर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में जाकर युवाओं से संवाद किया जाएगा। इस बाबत जल्द ही कार्यक्रम का ऐलान किया जाएगा।
आईडीपीएल के मैदान से करीब 12 किमी का मार्च करते हुए लोग जब पहली खेप में त्रिवेणी घाट पहुंचे तो एकबारगी लगा कि लोगों का हौसला सीमित ही है लेकिन कुछ ही देर में एक के बाद एक जत्थे त्रिवेणी घाट पहुंचे तो देखते ही देखते हजारों हजार लोग भीषण गर्मी के बावजूद हुंकार भरने लगे। सत्ता प्रतिष्ठान के लिए यह एक तरह से चेतावनी सी लगी कि अब उत्तराखंड के लोग बहकावे में आने वाले नहीं हैं।
इसी के साथ राज्य में नशे की बिक्री पर भी पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की मांग पर जोर दिया गया है। इन्हीं मांगों को लेकर आंदोलन के नेता मोहित डिमरी ने लोगों की नब्ज पर हाथ रखते हुए कहा कि क्या आपको मंजूर है कि हमारी जमीन पर बने एम्स में बाहरी लोगों को नौकरियां दी जा रही हैं और पहाड़ के नौजवान मुंह ताकते रह गए हैं। अंकिता हत्याकांड के सबब बने उस वीआईपी का खुलासा करने पर भी जोर दिया गया जिसके बारे में विधानसभा में मंत्री प्रेमचंद ने कहा था कि कोई वीआईपी नहीं है बल्कि वीआईपी रूम था।
अपने ही राज्य में मूल निवासियों की पहचान का संकट खड़ा हो गया है। अब हमारे अपने ही प्रदेश में कोई हैसियत नहीं रह गई है। हमारी पहचान के साथ ही हमारी संस्कृति, नौकरी, रोजगार, जमीन सहित तमाम आर्थिक संसाधनों पर बाहर से आए लोगों का कब्जा होता जा रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण मूल निवास 1950 की व्यवस्था को खत्म करना और कमजोर भू कानून लागू होना है।
डिमरी ने कहा कि कहा कि कमजोर भू कानून के कारण बाहर के पूंजीपति हमारी जमीन खरीद रहे हैं। उत्तराखंड में बाहर से आए लोगों ने पहाड़ के पहाड़ अपने नाम कर लिए हैं। इसके लिए सरकार को सशक्त भू- कानून बनाना चाहिए। उन्होंने सभी लोगों को त्रिवेणी घाट गांधी स्तंभ पर गंगाजल लेकर शपथ दिलाई कि वह उत्तराखंड राज्य की तरह इस आंदोलन को भी निर्णायक रूप देने के लिए सक्रिय रहेंगे।
सामाजिक कार्यकर्ता एलपी रतूड़ी, विकास सेमवाल, हर्ष व्यास, सुदेश भट्ट, हिमांशु पंवार, अनिल डोभाल, गोकुल रमोला, कुसुम जोशी, पंकज उनियाल, प्रमोद काला, उषा डोभाल, सुरेंद्र रावत, आशीष नौटियाल, नमन चंदोला, शूरवीर चौहान, नीलम बिजल्वाण, केपी जोशी ने कहा कि इस आंदोलन को प्रदेशभर से लोगों का मजबूत समर्थन मिल रहा है।
प्रमुख मांगें
1- प्रदेश में मूल निवास की कट ऑफ डेट 1950 घोषित की जाए। इसके आधार पर मूल निवासियों को सरकारी और प्राइवेट नौकरियों, ठेकेदारी, सरकारी योजनाओं सहित तमाम संसाधनों में 90 प्रतिशत हिस्सेदारी दी जाय।
2- प्रदेश में मजबूत भू-कानून लागू हो, जिसके तहत शहरी क्षेत्रों में 200 वर्ग मीटर भूमि खरीदने की सीमा लागू किया जाए तथा इसकी खरीद के लिए 30 वर्ष पहले से उत्तराखंड में रहने की शर्त लागू हो।
3- प्रदेश के समस्त ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि खरीदने-बेचने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगे।
4- राज्य गठन के बाद से वर्तमान तिथि तक सरकार द्वारा विभिन्न व्यक्तियों, संस्थानों, कंपनियों आदि को बेची गई और दान व लीज पर दी गई भूमि का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए।
5- प्रदेश में किसी भी तरह के उद्योग के लिए जमीन को 10 साल की लीज पर दिया जाय। इसमें भी पचास प्रतिशत हिस्सेदारी स्थानीय लोगों की तय की जय और ऐसे सभी उद्यमों में 90 प्रतिशत रोजगार स्थानीय लोगों को दिया जाना सुनिश्चित किया जाए। जिस उद्योग के लिए जमीन दी गई है, उसका समय-समय पर मूल्यांकन किया जाय। इसी आधार पर लीज आगे बढ़ाई जाय.
स्वाभिमान महारैली को लेकर आईडीपीएल से त्रिवेणी घाट तक चप्पे चप्पे पर भारी संख्या में पुलिस मौजूद रही। रैली में मोहित डिमरी और लुसून टोडरिया के अलावा शिव प्रसाद सेमवाल, सुदेश भट्ट, राकेश सिंह नेगी, मनोज गोसाई, कुसुम जोशी, संजय सिंसवाल, राजेंद्र गैरोला, रामकृष्ण पोखरियाल, उत्तम असवाल, करण सिंह पवार, पूर्व विधायक ओमगोपाल रावत, पांजल नौडियाल, हिमांशु रावत, एलपी रतूड़ी, वी के धस्माना,मोहन रावत, शशि रावत, प्रभाकर पैन्यूली, एडवोकेट लालमणि रतूड़ी, हिमांशु बिजल्वाण, एडवोकेट लक्ष्मण सिंह राणा, धूम सिंह भंडारी, शूरवीर सिंह रावत, कमल राणा, सुनीता देवी, रजनी देवी, लक्ष्मण सिंह चौहान, आशुतोष शर्मा, गैणी देवी, भगवती प्रसाद सेमवाल हजारों की संख्या में लोग मौजूद थे।
