उत्तराखंड पत्रकार महासंघ द्वारा हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर पत्रकारिता गौरव सम्मान समारोह 2024 कार्यक्रम आयोजित किया गया
देहरादून। सर्वे चौक समीप आईआरडीटी प्रेक्षागृह में उत्तराखंड पत्रकार महासंघ द्वारा हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित किया गया ।

इस अवसर पर महासंघ द्वारा अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया। कार्यक्रम में महासंघ की नवनिर्वाचित देहरादून जनपद की कार्यकारिणी ने शपथ ग्रहण एवम पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले पत्रकारों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में आए हुए मुख्य अथिति गणों ने हिंदी पत्रकारिता के विषय में अपने अपने विचार प्रकट किए। इस अवसर विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार व डीएवी महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डा देवेन्द्र भसीन, वरिष्ठ पत्रकार राम प्रताप मिश्र साकेती, रविन्द्र नाथ कौशिक आदि मौजूद रहे।

कार्यक्रम के अंत में उत्तराखंड पत्रकार महासंघ के केन्द्रीय अध्यक्ष निशीथ सकलानी जी ने उपस्थित सभी अतिथियों/पत्रकारों का आभार धन्यवाद व्यक्त किया एवम हिंदी पत्रकारिता दिवस शुभारंभ के विषय जानकारी दी आज पत्रकारों के आगे जो समस्याएं आ रही का विषय भी प्रस्तुत किया।

हिंदी पत्रकारिता विषय। 30 मई भारत में हिन्दी पत्रकारिता के लिए खास तारीख है। दरअसल इसी दिन देश में हिन्दी भाषा में ‘उदन्त मार्तण्ड’ के नाम से पहला समाचार पत्र वर्ष 1826 को छपा था। इसलिए इस तारीख को हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इसे कलकत्ता (अब कोलकाता) से साप्ताहिक के तौर पर शुरू किया था। इसके प्रकाशक और संपादक भी वे खुद थे।
30 मई 1826 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ से हुई थी पहले हिंदी समाचार पत्र की शुरुआत
इस तरह हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले पंडित जुगल किशोर शुक्ल का हिन्दी पत्रकारिता जगत में विशेष सम्मान है। जुगल किशोर शुक्ल वकील भी थे और कानपुर के रहने वाले थे। उस समय औपनिवेशिक ब्रिटिश भारत में उन्होंने कलकत्ता को अपनी कर्मस्थली बनाया।
हिंदुस्तानियों के हक के लिए उठाई थी आवाज
परतंत्र भारत में देशवासियों के हक की बात करना बहुत बड़ी चुनौती बन चुका था। इसी के लिए उन्होंने कलकत्ता के बड़ा बाजार इलाके में अमर तल्ला लेन, कोलूटोला से साप्ताहिक ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन शुरू किया। यह साप्ताहिक पत्र हर हफ्ते मंगलवार को पाठकों तक पहुंचता था।
इस साप्ताहिक समाचार पत्र के पहले अंक की 500 प्रतियां छपी थी
परतंत्र भारत की राजधानी कलकत्ता में अंग्रेजी शासकों की भाषा में अंग्रेजी के बाद बांग्ला और उर्दू का प्रभाव था। इसलिए उस समय अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी में कई समाचार पत्र निकलते थे। हिन्दी भाषा का एक भी समाचार पत्र मौजूद नहीं था। 1818-19 में कलकत्ता स्कूल बुक के बांग्ला समाचार पत्र ‘समाचार दर्पण’ में कुछ हिस्से हिन्दी के भी होते थे। इस लिहाज से ‘उदन्त मार्तण्ड’ साहसिक प्रयोग था। इस साप्ताहिक समाचार पत्र के पहले अंक की 500 प्रतियां छपी।
अखबार के शुरू होते ही सामने आईं कई चुनौतियां
हिन्दी भाषी पाठकों की कमी की वजह से उसे ज्यादा पाठक नहीं मिल सके। दूसरी बात की हिन्दी भाषी राज्यों से दूर होने के कारण उन्हें समाचार पत्र डाक द्वारा भेजना पड़ता था। डाक दरें बहुत ज्यादा होने की वजह से इसे हिन्दी भाषी राज्यों में भेजना भी आर्थिक रूप से महंगा सौदा हो गया था।
4 दिसम्बर, 1826 को इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया
पंडित जुगल किशोर ने सरकार से बहुत अनुरोध किया कि वे डाक दरों में कुछ रियायत दें जिससे हिन्दी भाषी प्रदेशों में पाठकों तक समाचार पत्र भेजा जा सके, लेकिन ब्रिटिश सरकार इसके लिए राजी नहीं हुई। किसी भी सरकारी विभाग ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ की एक भी प्रति खरीदने पर भी रजामंदी नहीं दी। पैसों की तंगी की वजह से ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन बहुत दिनों तक नहीं हो सका और आखिरकार 4 दिसम्बर, 1826 को इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया। आज का दौर बिलकुल बदल चुका है।
उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है ‘समाचार-सूर्य
उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है ‘समाचार-सूर्य‘। अपने नाम के अनुरूप ही उदन्त मार्तण्ड हिन्दी की समाचार दुनिया के सूर्य के समान ही था। उदन्त मार्तण्ड के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए जुगल किशोर शुक्ल ने लिखा था जो यथावत प्रस्तुत है-”यह उदन्त मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हेत जो, आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाली में जो समाचार का कागज छपता है उसका उन बोलियों को जान्ने ओ समझने वालों को ही होता है। और सब लोग पराए सुख सुखी होते हैं। जैसे पराए धन धनी होना और अपनी रहते परायी आंख देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का मिलना कठिन ही है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं।”
‘अस्तांचल को जात है उदन्त मार्तण्ड’ वाले अंक के साथ अस्त हुआ हिंदी पत्रकारिता का सूरज
पैसों की तंगी की वजह से ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन बहुत दिनों तक नहीं हो सका और आखिरकार चार दिसम्बर 1826 को इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया। शुक्ल को 79 अंक निकालने के बाद अंतिम अंक में लिखना पड़ा कि, ‘आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।’ लेकिन डेढ साल में ही डूबने वाले इस ‘‘मार्तण्ड’’ ने जो रोशनी भविष्य की पीढ़ी को दिखाई उसका लाभ स्वाधीनता आन्दोलन को भी मिला। बंद होने से पहले इसने हिंदी पत्रकारिता के सूर्य को उदित कर दिया था जो आज भी देदीप्यमान है।
