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धाद के कोना कक्षा का अभियान के अंतर्गत पहाड़ दिवस पर हुआ आयोजन

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पहाड़ के स्कूलों ने दो सदी में समाज को गढ़ा है उन्हें विरासत की तरह सहेजना होगा धाद के कोना कक्षा का अभियान के अंतर्गत पहाड़ दिवस पर हुआ आयोजन  

पहाड़ में शिक्षित होने की अदम्य इच्छा मौजूद रही है जिसके कारण तमाम दिक्कतों के बावजूद वहां के निवासियों ें ने शिक्षत होकर दुनिया में अपना स्थान बनाया है पहाड़ दिवस के अवसर पर धाद के आयोजन में यह बात उप निदेशक,विद्यालयी शिक्षा शिव प्रसाद सेमवाल ने कही आयोजन के मुख्या वक्त शिक्षाविद शिव प्रसाद सेमवाल ने कहा की पहाड़ में औपचारिक शिक्षा का  इतिहास  दो सदी पुराना रहा है जिसने पहाड़ में कई पीडियों का अकार देने में काम किया है औपचारिक शिक्षा के रूप में पहला स्कूल राजा  प्रद्युम्न शाह के काल में पौड़ी जिले में 1802 में दुधारखजाल में पहला स्कूल खुला दूसरा स्कूल 1876 में  प्रताप शाह  में टिहरी में स्कूल खुला अनौपचारिक शिक्षा ज्योतिष आदि के रूप में  जारी रही ब्रिटिश गढ़वाल में प्राथमिक और मिडिल स्कूलों की स्थापना की जा रही थी लेकिन ऐसा अन्य स्थानों  पर नहीं था   शिक्षा को आजादी के बाद नीति निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया लेकिन बड़ा बदलाव तब आया जब मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करने की एक लम्बी लड़ाई लड़ी गयी है और 2009 में जिसके बाद पहाड़ में बड़ी संख्या में स्कूल सामने आये राज्य बनने के बाद इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी हुई लेकिन पलायन और अन्य कारणों के चलते आज स्कूलों के सामने अपने अस्तित्व का संकट है और बड़ी संख्या में स्कूल बंद होने के कगार  पर है. जबकि पहाड़ों में पढ़ाई हासिल करने की एक इच्छा रही है और तमाम दुश्वारियों के बावजूद पहाड़ के स्कूल तक छात्र पहुचं रहे हैं. सके लिए उन्होंने उदाहरण दिया कि सबसे समृद्ध जिले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में शिक्षा की ललक सबसे कम है। पूर्व में पर्वतीय जिलों में स्थापित सहायता प्राप्त विद्यालय सम्पन्न लोगों और ट्रस्टों द्वारा कम संशोधन होते हुए भी खोले गए यह शिक्षा के प्रति ललक ही थी। लेकिन पलायन और कम होती छात्र संख्या ने नयी चुनौतोया ख ड़ी कर दी है


शैलेन्द्र अमोली ने कहा की पहाड़ के स्कूल समाज की विरासत हैं उन्हें उसी तरह बचाया जान चाहिए जैसे हमने अपनी सांस्कृतिक विरासत को संभाला है आज शिक्षा क्रय की वस्तु बन गयी है जिसमे हर व्यक्ति अपनी क्रय क्षमता के हिसाब से शिक्षा खरीद रहा है ऐस में राजकीय स्कूल की चुनौती बढ़ गयी है.न्होंने कहा कि राजकीय स्कूलों को अपनी छवि बदलने की आवश्यकता है । आजकल स्कूल वर्ग विशेष के अनुसार संचालित हो रहे हैं और राजकीय स्कूलों में वे बच्चे रह गए हैं जिनके पास कोई विकल्प नहीं है। पहाड़ में शिक्षा की चुनौतियाँ में पलायन के साथ नयी टेकनीक का भी अभाव है राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हाल ही में स्थानीय भाषाओ को पढ़ाई का हिस्सा बनाया है जिसके बहुत  परिणाम देखने में आये है शिक्षक अथक प्रयास कर रहे हैं। इन स्कूलों की दशा बदलने के लिए सरकार, समाज विधायिका, शिक्षक सभी को एकजुट प्रयास करने होंगे।

आयोजन का सञ्चालन तन्मय ममगाईं  ने किया। सभा की अध्यक्षता लोकेश नवनि ने की इस अवसर पर डा. नीलम प्रभा वर्मा, रामेंद्री मंद्रवाल , मधु सिंह, टी आर बरमोला,  नीना रावत, कमलेश खंतवाल, दिनेश सिंह, महावीर सिंह रावत, संजय सोलंकी, अभिषेक बडोला, ईश मोहन भट्ट, सुनीता चौहान, सुधीर डोबरियाल, राजीव पांथरी, लक्ष्मी पंवार, अनुपमा सेमवाल, सुनीता बहुगुणा, डा. एस बंसल, रीना सेठी, शांति प्रकाश जिज्ञासु, पंकज क्षेत्री, अजीत सिंह, देवेन्द्र कांडपाल, सुनील भट्ट आदि

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