देहरादून उत्तराखंड में प्रसिद्ध सिद्ध पीठ शिव मंदिरों में भक्तों ने किया जलाभिषेक।
आज उत्तराखंड के प्रसिद्ध सिद्ध पीठ शिव मंदिरों में भक्तों ने किया जलाभिषेक जय कारों से गूंज उठी देव भूमि
देहरादून डोईवाला

कुआँ वाला स्थित सिद्ध शिव लिंग पर भक्तों ने किया जलाभिषेख बाबा भले के जयकारों से गूंज उठी दून नगरी साथ ही भक्तों ने यहाँ स्थित माता काली के भी जय करे लगाएं।

नीलकंठ महादेव मंदिरः

नीलकंठ महादेव मंदिर मणिकूट पर्वत पर विराजमान है। नीलकंठ महादेव के विषय में कहा जाता है कि जब देव दानवों के द्वारा मंदराचंल पर्वत का मंथन किया गया था और मंथन के दौरान 14 रत्न निकले तो उनमें से एक हलाहल विष भी निकला, जिसको भगवान भोलेनाथ ने उसे सृष्टि की रक्षा के लिए घटक लिया और कुछ जहर उनके गले में रूक गया, जहर की ज्वाला को शांत करने के लिए भगवान शिव शंकर मणिकूट पर्वत की ओर आ गये और यहॉ आकर उस विष के प्रभाव को समाप्त करने के लिए तप करने लग गये, उनके पीछे पीछे माता पार्वती भी आ गयी, और भगवान भोलेनाथ के जहर के प्रभाव को कम करने के लिए स्वंय भी तप में लीन हो गयी। तब माता पार्वती ने अपना स्थान पास में ही भुवनेश्वरी मंदिर को चुना। तब से भगवान भोलेनाथ का यह मंदिर नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
नीलकंठ मंदिर में सावन के महीने में कॉवड़ यात्रा का विशेष प्रावधान माना गया है, इसलिए शिवभक्त कॉवड़ लेकर सावन माह में यहॉ जलाभिषेक के लिए विशेष रूप से आते है। ऋषिकेश से लक्ष्मणझूला, काण्डी मोटर मार्ग से यहॉ पहॅुचा जा सकता है।
महावगढ मंदिरः यमकेश्वर क्षेत्र के एक ओर जहॉ उत्तर में भगवान नीलकंठ निवास करते हैं वही पूरब दिशा में महावगढ मंदिर हिमकूट पर्वत पर विराजमान है। कहा जाता है कि यह स्वयभूं लिग है। राजा भरत के माता शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र है, जिनके नाम से भारत देश हुआ का जन्म भी कण्व घाटी में हुआ। कण्व घाटी मालन नदी पर स्थित है, इस घाटी को ऋषि मुनियों की घाटी कहा जाता है, यहॉ ऋषि मुनी तपस्यालीन रहते थे, कहा जाता है कि जब दाराशिकोह औरंगजेब से युद्ध हारकर अपने पुत्र सुलेमान शिकोह के साथ श्रीनगर के राजा पृथ्वीपति शाह के दरबार में कुछ वर्षों तक रहा तब औंरगजेब की सेना दाराशिकोह को खोजने के लिए सहारनपुर के रास्ते हरिद्वार के रास्ते लालढांग होते हुए कोटद्वार की ओर आगे बढ रहे थे तब वह नदी में रास्ता भटक गये और मालन नदी की ओर से मालन घाटी की ओर चले गये, कुछ दिन तक रास्ता भटकने के बाद वह महावगढ पहुॅचे, महावगढ भानू असवाल गढपति का गढ था वहॉ भानू असवाल की सेना से औंरगजेब की सेना का युद्ध हुआ, औंरगजेंब की सेना हार गयी लेकिन वे महावगढ के शिवलिंग को अपने साथ ले गये, किवदंती है कि आज भी काबा में महावगढ का ही शिविंलंग विराजमान है,हालांकि अभी तक इसके पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह जनश्रुति है।

महावगढ मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहॉ शिवजी स्वयंभू रूप में विराजमान है, और यहॉ से हिमालय के सभी उच्च पर्वत श्रेणी दिखायी देती हैं, साथ ही जनश्रुति है कि इस मंदिर की परछायी हरि की पैड़ी हरिद्वार में पड़ती है, और यहॉ पर अंदर ही अंदर एक सुंरग है, जिस रास्ते से ऋषि मुनी गंगा स्नान के लिए जाया करते थे। महावगढ मंदिर कोटद्वार के रास्ते दुगड्डा पौखाल के रास्ते तथा हरिद्वार ऋषिकेश के रास्ते से लक्ष्मणझूला नीलकंठ काण्डी सड़क मार्ग से पहुॅच सकते हैं, इसकी अपनी आध्यात्कि महत्व है।
यमकेश्वर महादेव मंदिरः यमकेश्वर महादेव का मंदिर यमकेश्वर क्षेत्र का प्रसिद्ध मंदिर है। धर्म ग्रन्थों के अनुसार जब मर्कण्डू ऋषि की कोई संतान नहीं थी तो उन्होनें अपने तब बल से शिवजी से वरदान प्राप्त किया। भगवान शिव ने मार्केण्डू ऋषि से कहा कि तुम्हे गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहिए या फिर 16 साल का अल्पायु किंतु गुणी पुत्र, मार्केण्डू ऋषि ने अल्पायु किंतु गुणी पुत्र वरदान में मॉगा। तब मार्केण्डू ऋषि ने अपना पुत्र का नाम मार्केण्डेय रखा। जब मार्केण्डेय 15 साल का हो गया तो उनके पिता ऋषि मार्केण्डू ने उन्हें महामृत्युजंय का तप करने को कहा, मार्केण्डेय तप में लीन हो गये, 16 साल का जैसा ही मार्केण्डेय हुआ यम उनके प्राण लेने आ गये।
जनश्रृति है कि यमकेश्वर क्षेत्र के में खेड़ा से युद्ध शुरू हुआ और जिमराड़ी से होते हुए भड़ेथ गॉव में यम और शिव में भयानक भिडंत हुई, इस कारण इस क्षेत्र को भड़ेथ कहा गया। इनके युद्ध को देखकर उमा रोने लगी। तब भडेथ के पास उमारोली गॉव आज भी मौजूद है। यम और शिवजी युद्ध करते हुए जामल से होते हुए यमकेश्वर पहॅुचे वहॉ पर शिवजी ने यमराज को परास्त कर वहीं अदृश्य हो गये तब मार्केण्डेय ऋषि ने वहॉ पर शिवलिंग की स्थापना कर पूजा अर्चना और तप करने लगे। यमकेश्वर मंदिर के प्रागण से सतेड़ी यानी शतरूद्रा नदी प्रवाहित होती है, कहा जाता है कि इस क्षेत्र में 100 रूद्र यानी छोटे छोटे शिवलिंग होते थे। यमकेश्वर महादेव के मंदिर में शिवरात्रि का मेला लगता है। इस मंदिर में कोटद्वार और ऋषिकेश से सड़क मार्ग से पहॅुचा जा सकता है।
तालेश्वर महादेवः तालेश्वर महादेव मंदिर ताल घाटी क्षेत्र में बना हुआ है, यह मंदिर केदारनाथ का प्रतीक स्वरूप है। अब हम भौगोलिक स्थिति के अनुसार तालेश्वर धाम से परिचय कराते हैं, केदारनाथ और तालेश्वर धाम में निम्न समानताएं पायी जाती हैं-
1- केदारनाथ की तरह तालघाटी भी घाटी में बसा शिव धाम है।
2- केदारनाथ धाम मन्दाकिनी नदी तट पर है, जबकि तालेश्वर ताल नदी के तट पर।
तालेश्वर धाम लोक मान्यतानुसार भगवान शिव का गुप्त स्थान है, जनश्रुति के अनुसार वेदों और पुराणों में वर्णन आता है कि जब भष्मासुर राक्षस ने भगवान भोलेनाथ का कठोर तप करके भोले भंडारी को खुश कर उनसे वरदान में भष्म कंकण प्राप्त कर लिया तो तब भस्मासुर ने भष्म ककंण का उपयोग पहले भगवान भोलेनाथ पर ही करने के लिये आतुर हो गया तो तब भगवान शिव ने अपनी जान बचाते हुए हिमालय से निकल पड़े, तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप रखकर भस्मासुर को रिझा लिया। भस्म ककंण को नृत्य के भाव भंगिमाओ से खुद भस्मासुर को उसके हाथों ही उसके सिर पर रखकर उसे भष्म कर दिया। जब भोलेनाथ भष्मासुर से अपनी जान जोखिम से बचाते हुए तालेश्वर धाम में आये और गुप्त रूप में अंतर्धान हो गए।

दूसरी लोक मान्यता यह है कि 1989 में जँहा पर वर्तमान मंदिर निर्मित है वँहा पर एक साल के पेड़ का ठूंठ था जिस पर कुछ समय तक पानी और सफेद दूध के जैसे द्रवित पदार्थ का श्राव होता रहता था। एक बार वँहा पर नेपाली मूल का परिवार काम करने आये हुए थे, उन्हें चूल्हा जलाने के लिये सूखी लकड़ी की जरूरत थी तो उन्होंने उस साल के ठूंठ को अनजाने में काट लिया, रात को उसकी लकड़ी से चूल्हा जला और उनमे खाना बनाकर खा लिया, सपरिवार सब लोग सो गए। लेकिन एक ऐसी घटना घटित हुई जिसने सबको चकित कर दिया। पूरा नेपाली परिवार तक तीन दिन तक बेसुध सोया रहा, अगले दिन जब परिवार की महिला जिसका नाम पार्वती था वह चीखने चिल्लाने लगी और नाचते हुए उस खूंटे के पास पहुंची उसके साथ अन्य लोग भी पहुंचे तो देखा कि उस साल के खूंटे पर साँप लटका हुआ था, वह नेपाली मूल की महिला उस सांप को पकड़कर नाचते हुए कहने लगी कि यँहा पर मेरा स्थान है, और यँहा पर मंदिर बनवाओ।
तालेश्वर मंदिर जिला पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर प्रखंड के मल्ला बनास ग्राम सभा का तालघाटी के ताल सहजादा में अवस्थित है, यह ऋषिकेश से 22 किलोमीटर दूर और हरिद्वार से 30 किलोमीटर दूर राजाजी नेशनल पार्क होते हुए यँहा पहुँचने के लिये दो रास्ते हैं, जो गंगाभोगपुर ( कौड़िया) से है। पहला कच्चा रास्ता जो जोखिम भरा जरूर है लेकिन प्रकृति प्रेमी और वाइल्डलाइफ के शौकीन लोगो के लिये इस रास्ते मे जाते हुए हाथियों के दर्शन साथ ही अन्य जंगली जानवरों को निहारते हुए आगे माता रानी माँ विंदयवासनी के दर्शन करते हुए आप आगे तीन किलोमीटर दूर कच्चे रास्ते पर जाते हुए तालेश्वर धाम पहुंचा जा सकता है।
वंही दूसरा रास्ता गंगाभोगपुर से डांडामण्डल के लिये जाने वाली सड़क से जंगल का लुफ्त उठाते हुए, प्रकृति को आलिंगन करते हुए पहाड़ के टेढ़े मेढ़े जोखिम भरे सड़क पर ट्रेक करते हुए कांडाखाल जा सकता है। कांडाखाल से लिंक रोड जो तालघाटी के लिये निकली है, घुमावदार सड़को से होते हुए तालेश्वर धाम में भगवान भोलेनाथ के दर्शन कर अविभूत हो सकता है।
कोटेश्वर महादेवः कोटेश्वर महादेव मंदिर डांडामण्डल क्षेत्र के धारकोट गॉव में अवस्थित है। यह मंदिर भी बहुत प्राचीन माना जाता है, इस मंदिर के बारे में जनश्रुति और लोक मान्यता है कि धारकोट गॉव पहले पूरब दिशा में मंदिर के सामने वाली पहाड़ी पर बसा हुआ था, कहा जाता था कि गॉव में अकेली बुढिया धार में एक कुटिया में रहती थी, वह कंद मूल फल खाकर ज्यादा गुजर बसर करती थी, शिवरात्रि के पहले दिन बरसात होने के कारण सांय के समय वह कंद मूल फल यानी तैड़ू लेने जंगल की तरफ गयी। जिस स्थान पर वर्तमान में मंदिर बना हुआ है, वहॉ पर वह तैड़ू निकालने लगी, लेनिक तैडू खोदते खोदते काफी समय हो गया लेकिन तैड़ू नहीं निकला, कहते हैं कि वह तैड़ू नीचे नीचे जाने लगा, आगे पत्थर आया और पत्थर पर जैसे ही कुदाल लगी उससे दूघ जैसे पदार्थ निकलने लगा, बुढिया ने सोचा कि यह तैडू पर कूटी लग गयी है, लेकिन उस पर दूध की धारा निकलने लगी, कहते हैं कि बुढिया के लाख कोशिश के बाद भी जब तैड़ू नहीं निकला तो वह निराश होकर घर आ गयी, घर आकर देखा तो पूरी कुटिया तैड़ू के फलो से भरी हुई थी, वह जितना बाहर निकालती अंदर दुगना हो जाता। थक हारकर बुढिया बाहर ही सो गयी, रात को सपने में कोई आया और उसने कहा कि यह फल मैने दिये हैं, जिस स्थान पर तुम तैड़ू निकाल रही थी वहॉ पर शिवलिंग है, वहॉ पर मेरा निवास है। अगले दिन बुढिया जब वहॉ पर गयी तो वहॉ पर शिवलिंग स्वतः ही स्िापित था, तब से लेकर यह कोटेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

बिलवेश्वर महादेवः मोहनचट्टी के पास महादेव सैण नामक स्थल पर बिलेश्वर महादेव पुराने बद्रीनाथ मार्ग पर अवस्थित है। विलेश्वर महादेव मंदिर हेंवल नदी के किनारे अवस्थित है, कहा जाता है कि खाण्डेश्वरी देवी के मंदिर के दर्शन से पूर्व इस मंदिर के दर्शन करना ज्यादा फलदायी माना गया है। यहॉ पर तल्ला ढॉगू बिछला ढांगू के लोग यहॉ दर्शन के लिए आते थे यहॉ पर सावन के महीने में मेला लगता था। इसके अतिरिक्त अन्य गॉवों में भी अन्य शिवालय अवस्थित है। महादेव सैण में पहले यात्री यहॉ विश्राम करने के बाद बिलवेश्वर महादेव के मंदिर को केदारनाथ का प्रतीक मानकर तब इसकी पूजा अर्चना करने के बाद आगे की यात्रा करते थे।

इसके अतिरिक्त यमकेश्वर में अन्य प्राचीन शिवालयों में अमोला गॉव में उग्रेश्वर महादेव का मंदिर है, यहॉ महिलाओं का प्रवेश बर्जित माना गया है, इसके अतिरिक्त देवराना मे चमलेश्वर महादेव मंदिर, किमसार में कालेश्वर महादेव, मल्ला बनास में बागेश्वर महादेव,, गंगाभोगुपर में मोटा महादेव, खेड़ा गुजराड़ी में ढमकेश्वर महादेव, मोहनचट्टी के पास बिलेश्वर महादेव मंदिर प्रसिद्ध है। विलेश्वर महादेव मंदिर हेंवल नदी के किनारे अवस्थित है, कहा जाता है कि खाण्डेश्वरी देवी के मंदिर के दर्शन से पूर्व इस मंदिर के दर्शन करना ज्यादा फलदायी माना गया है। यहॉ पर तल्ला ढॉगू बिछला ढांगू के लोग यहॉ दर्शन के लिए आते थे यहॉ पर सावन के महीने में मेला लगता था। यह मंदिर पुराने बद्रीनाथ मार्ग पर अवस्थित है। इसके अतिरिक्त अन्य गॉवों में भी अन्य शिवालय अवस्थित है।
