उत्तराखंड

विधानसभा चुनाव में स्थानीय जन मुद्दे गायब, व्यक्ति विशेष

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देहरादूनः इस समय देश के पॉच राज्यों में चुनाव प्रचार चल रहा है, राज्य स्तरीय चुनाव में इस बार एक भी स्थानीय या राज्य विकास के मुद्दे गायब हो गये हैं, जो लोग पहले उत्तराखण्ड में विकास नहीं हुआ है का राग अलापते हैं, वह सोशल मीडिया में काग्रेंस एवं अन्य दल देश के प्रधानमंत्री की फोटो वायरल कर उन पर छींटा कशी कर रहे रहे हैं, जबकि वह किसी दल के नही बल्कि देश के प्रधानमंत्री हैं, वह पूरे देश को प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं बीजेपी वाले राहुल गॉधी और उनके परिवार को केन्द्रित करके वार प्रतिवार करते नजर आ रहे हैं। उत्तराखण्ड में हरीश रावत से लेकर पुष्कर सिंह धामी और तीन मुख्यमंत्री बदले जाने को लेकर उनके व्यक्तिगत बयानों और छींटा कशी करके सोशल मीडिया पर चला रहे हैं। हर पार्टी के नेताओं ने विवादित बयान समय समय पर दिये हैं, जिनका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा है, जनता ने उनको नकारा भी है।
विधानसभा चुनाव के समय सोशल मीडिया में जिस तरह से स्थानीय मुद्दे गायब हैं, विकास और आने वाले भविष्य के लिए क्या योजनायें होनी चाहिए इस पर किसी का भी फोकस नहीं हैं, सोशल मीडिया में चलने वाली अनाप शनाप पोस्टों को देखकर लगता है कि जनता को भी विकास से कोई मतलब नहीं रह गया है, हर कोई राजनीतिक दलों के मुखियाओं पर छीटांकशी और ओछे शब्दों का प्रयोग करने को ही विकास मान ले रहे हैं। उत्तराखण्ड में किसी भी दल के पास भविष्य की योजना नजर नहीं आ रही है, आयेगी भी नहीं क्येंकि अब सारा फोकस व्यक्ति विशेष की टीका टिप्पणी पर व्यतीत हो रहा है।
राज्य में जिस तरह से बीजेपी और कागेंस धर्म पर आधारित राजनीति को केन्द्र में रखकर स्थानीय और जन मुद्दो को भटकाने का काम कर रहे हैं, काग्रेस की तुष्टिकरण की नीति ने देश में पहले जहॉ बॉटने का काम किया उसी राह पर बीजेपी भी चलने लगी है, दोनों दलों ने स्थानीय मुद्दों को धर्म की राजनीति पर ला खड़ा कर दिया है। जबकि राष्ट्रपिता महात्मा गॉधी ने कहा था कि राजनीति को धर्म में नहीं आना चाहिए और धर्म को राजनीति में नहीं आनी चाहिए यदि यह इसमें समिश्रण हो जाय तो दोनों के लिए शहद और घी का मिश्रण कर जहर बन जायेगा।
यहॉ पर राष्ट्रवाद और अन्य मुद्दों के साथ उत्तराखण्ड राज्य को एक नई दिशा देने के लिए राज्य निर्माण की मॉग की गई थी, लेकिन उत्तराखण्ड में स्थानीय जनमुद्दे चुनावों में गायब होना कहीं ना कहीं उत्तराखण्ड राज्य के लिए घातक साबित होगा। पलायन आयोग से लेकर स्थानीय बेरोजगारों, स्वास्थ्य शिक्षा पर कोई भी बात करते हुए नजर नहीं आ रहा है। यूकेड़ी क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर मुखर तो रहती है, किंतु उन्हें जनता स्वीकार नहीं कर पाई है, जबकि आम आदमी पार्टी के पास यहॉ विकास का कोई ठोस रोड़ मैप नहीं है, वह अवसर को भुनाने की कोशिश कर रही है, अवसरवादी राजनीति के कारण आप पार्टी का जनाधार का ग्राफ गिरता जा रहा है।
उत्तराखण्ड की राज्य में बीजेपी सरकार के पास यहॉ पिछले पॉच साल के विकास की कोइ्र्र उपलब्धि नहीं है, केन्द्र की योजनाओं को गिनाकर मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रही है। जहॉ तक मुख्यमंत्री धामी की बात की जाय तो उन्होंने आखिरी 06 माह में जो निर्णय लिये वह जनहितकारी माने जा सकते है, उन्होंने हर वर्ग को साधने में सफल रहे, उनकी छवि के कारण कहीं ना कहीं बीजेपी को लाभ मिला है। वहीं काग्रेंस के पास सत्ता पक्ष के खिलाफ मॅहगाई और बेरोजगारी का माहौल बना रही है, लेकिन काग्रेस की तुष्टिकरण की नीति उसके लिए सबसे बड़ी घातक है, राज्य में धर्म विशेष के लिए विश्वविद्यालय खोलने वाला पत्र और बयान और इसी तरह से विशेष अवकाश दिया जाना उनके लिए गले की हड्डी बन गयी है, ऐसे वकतव्य से जनता में नकारातम्क संदेश प्रसारित हो रहा है।
विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीस मुद्दों की अपेक्षा क्षेत्रीय एवं राज्य के विकास की अवधारणा से संबंधित मुद्दो को दरनिकार करना राज्य निर्माण की मूल अवधारणा पर कुठाराधात करना जैसा है। अतः इस समय मतदाताओं को सभी मुद्दों को ध्यान में रखकर उत्तराखण्ड के विकास के लिए समुचित सरकार का चयन करना समीचीन प्रतीत होता है।

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