ग्राम देवताओं /क्षेत्रपाल/ लोकपाल देवताओं का पूजन और उनके थान
प्रसाद, खीर या फिर रोट होता है, जिसे एक आम व्यक्ति भी सरलता से बनाकर श्रद्धापूर्वक पूजन कर लेता है, एक धूप और अंगारे में घी डालकर उसके श्रद्धा रूपी धूपण से ही प्रसन्न हो जाते हैं।
ऐसे ही हमारे कुछ वन देवता जिसमें ब्यूरांळ रूप़द्यो आदि देवता होते हैं, जिसमें घसियारी या आने जाने वाले लोग घास, लोहा, बीड़ी, तम्बाकू आदि चढाकर अपनी सुरक्षा की कामना करते है, और यह वन देवता उनकी सुरक्षा भी करते हैं। ऐसे अनकों स्थानीय, क्षेत्रपाल या लोकपाल देवता जिनके प्रति लोगों की आस्था है, और उसी आस्था के फलस्वरूप आज भी हमारे पहाड़ों में देवत्व का निवास है, और कण कण में देवत्व विराजमान है।
लेकिन आज के समय में जो रूप बड़े बड़े मंदिरों के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं के भेष में कुछ अराजक तत्वों द्वारा देवभूमि को देवत्व को चुनौती दे रहे हैं, जिस तरह चारों धामों में रील्स और वीडियो बन रही हैं, जिस तरह नग्नता का प्रदर्शन और भोले के नाम पर नशा हो रहा है, उसका परिणाम दिखाई भी दे रहे हैं, िंकंतु हम आधुनिकता की आड़ में प्रकृति और यहॉ के देवत्व को नकार रहे हैं, वह आने वाले समय या जो हो रहा है उसको पहचानने में भारी भूल कर रहे हैं। अभी भी संभलने की जरूरत है और उत्तराखण्ड की इस पावन धरती को पावन ही बने रहने में और प्रकृति के साथ आदि मानव बनकर उसकी मूलत्व में छेड़छाड़ करना मानव समाज के लिए घातक सिद्ध होगा।
